Astrology

Acharya Mrityunjay Mishra

Astrology (ज्योतिष शास्त्र):-

।। श्री गणेशाय नमः ।।
यथा शिखा मयूराणां नागानां मणयो यथा ।
तदवद् वेदादिशस्त्राणां ज्योतिषं मूद्दीन वर्तते ।।

Astrology – Its like any other science , needs constant research . Astrologer needs to open and unbiased mind in ordwe to make provisions for the changing times . because livelihood is utmost importance to existance , therefore we belive that the creator has kept many possibilities hidden not only in your house bt to your Kundali houses .This thing make this topic more complex and a hart nut to crack .

Why Planets Affect us ?

So this question mark Marks lot of points in our life Daily life and are responsible for the result what we get from them .Lets come Point by Point why this happen to us.
1. Planets effects of other planets due to conjunctions , aspects or constellations ( Nakshatras)
2. Planets effect of the house or sign in which planet is posited
3. They effect of the house ( or houses) which are posited planet represented due to Lordship.

If planet is in its own friendly ,mooltrikona sign /or represents auspicious houses it becomes capable of giving favourable results bestowing honours and success on the native . On the other hand if planet represents an inauspicious house (or Houses) or falls in inimical or debilitated sign then the planets give unfavourable results. Some times , its contain very highly strength which depends upon degree wise position of the planet in a house and for that they can affect us very luckily or Badly in our Life. This is also a reasons that astrologer used to do Puja Havan for Grahas Shanti or to Control their bad luck to people life . As they affect you bt in a controlled way .

(यर्थात् जिस प्रकार मोर अपनी शिखा से शोया पाता है, पर्वत समूह मणियों की उपस्थिति से प्रकाशमान होते है। उसी प्रकार बंद एवं सभी शास्त्रों की शोभा 'ज्योतिषशास्त्र' से ही होती है।) ज्योतिषशास्त्र, अनादि काल से ही वेद का अंग माना गया है। चूकि वेदों में अधिकांश मंचकर्मकाण्ड के हैं, इसलिए अपनी कामनाओं की र्पूि के लिए अनादि काल से ही यज्ञों का आयोजन होता आया है। ये यज्ञ ही यजमान के वांछित फलों को प्रदान करते है। परन्तु यज्ञ कहाँ, कब एवं किस मूहूर्त आदि में हो, इसका समुचित निर्धारण ज्योतिषशास्त्र के गजितीय सिद्धान्तों से ही होत है। ज्योतिषशास्त्र वेद के आख है - ''बेदस्य निर्मलं चसुः ज्योतिः शास्त्रमकल्मषम्'' । जिस प्रकार मनुष्य आदि प्राणी आँखों के द्वारा संसार के पदार्थों का दर्शन करते है, उसी प्रकार ज्योतिषशास्त्र के द्वारा सूर्यादि ग्रहों के कालमान, गति, स्थिति के द्वारा मूहूर्त का निर्धारण किया जाता है। जिस भाग में ग्रहगति-सम्बन्धी अध्ययन होते है उन्हें सिद्धान् भाग कहा जाता है। ज्योतिषशास्त्र के जिस स्कन्ध के द्वारा मूहूर्तों का निर्धारण होता है, उसे 'संहिता भाग' कहते है। एवं जिस शा, के द्वारा जातक के भविष्य का निर्णय किया जाता है, उसे 'होरा स्कंघ' कहते है। अतः ज्यातिषशास्त्र के तीन स्कंध है।
''सिद्धान्तसंहिता होरा स्कंधरूपं त्रयात्मकम्'' चॅंूकि इस शास्त्र में ज्योतियों का (सूर्य, चन्द्र आदि) का विवेचन है, अतः इसे ज्योतिषशास्त्र कहते है। ज्योतिषशास्त्र का इतिहास बनाता है कि ज्योतिष के ग्रन्थों के दो विभाग हैं 'आर्ष प्रणीत' एवं अनुष्य-रचित' क्योंकि उन्होंने अपनी दिव्य-दृष्टि से ग्रहों का प्रभाव मानव जीवन पर किस प्रकार पड़ता है, यह निर्धारित किया था। उन्ही ग्रन्थों में 'वृहतपराशर होराशास्त्रम्', भृगसंहिता, आदि ग्रन्थ आते है। मनुष्य-रचित ग्रन्थों में महत्वपूर्ण स्थान वाराहमिहिर का 'पन्चसिद्धान्तिका', ब्रह्मगुप्त का 'ब्रलस्फुटसिद्धान्त', भास्कराचार्य का 'सिद्धान्त थिरोमणि' तथा जातक ग्रन्थों में 'वृहज्जातक, लघु जातक, जातक परिजात, फलदीपिका आदि है। मूहूर्त के ग्रन्थों में 'मूहूर्तचिन्तामणि', मूहूर्तमार्तण्ड, आदि विशेष प्रचलित है।

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